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वाशिंगटन। ऑस्ट्रेलिया में नस्लीय हमलों से ‘नस्लभेद’ शब्द इन दिनों सुर्खियों में है। श्वेत-अश्वेत का भेद यूं तो स?य और लोकतांत्रिक दुनिया की राह में रोड़ा माना जाता है, लेकिन एक अमेरिकी अध्ययन पर गौर करें तो नस्ल भेद सिर्फ मनुष्यों के बीच की घटना नहीं, मानव अंग भी इसका शिकार होता है। भारतीय मूल की एक अमेरिकी शोधकर्ता ने पाया कि शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग किडनी भी नस्लभेद करती है। अध्ययन के नतीजे दो समान नस्ल के व्यक्तियों में किडनी के दान-ग्रहण का सुझाव देते हैं।
हेनरी फोर्ड हॉस्पिटल की ट्रांसप्लांट नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. अनिता पटेल के अनुसार यदि अश्वेत की किडनी श्वेत को प्रत्यारोपित की जाती है तो ऑपरेशन के बाद उसके जीवन की अवधि उस श्वेत व्यक्ति के मुकाबले कम होती है, जिसे अपनी नस्ल के व्यक्ति की ही किडनी प्रत्यारोपित की गई होती है। डॉ. अनिता ने बताया कि उनकी टीम ने इस अध्ययन के लिए यूनाइटेड नेटवर्क ऑफ ऑर्गन शेयरिंग (यूएनओएस) से वर्ष 1995 से 2008 के बीच किडनी प्रत्यारोपण के 1,58,000 मामलों के आंकड़े इकट्ठा किए। शोध दल ने किडनी दाता और ग्रहण करने वाले की नस्ल और प्रत्यारोपण के बाद मरीज की जीवन प्रत्याशा के तथ्य जुटाए। डॉ. अनिता ने बताया कि नस्ल और प्रत्यारोपण की सफलता के बीच संबंध तलाशने में इन आंकड़ों की भूमिका महत्वपूर्ण थी। आंकड़ों के विश्लेषण में पता चला कि श्वेत (दाता-ग्रहणकर्ता) के बीच किडनी प्रत्यारोपण में मरीज हर हाल में स्वस्थ और लंबा जीवन पाने वाला रहा, जबकि अश्वेत-श्वेत के मामलों में रोगी जल्द ही हेपेटाइटिस-सी जैसे संक्रमण की चपेट में आ गया। यह संक्रमण ही उसकी मौत का कारण बना। अध्ययन की यह रिपोर्ट सान डियागो में अमेरिकन सोसायटी ऑफ ने फ्रोलॉजी की एनुअल मीटिंग में रखी गई।
क्या है अंग प्रत्यारोपण
अंग प्रत्यारोपण का अर्थ किसी शरीर से एक स्वस्थ और कार्यशील अंग निकालकर उसे किसी दूसरे शरीर के क्षतिग्रस्त या विफल अंग की जगह लगाने से है। अंग दाता जीवित और मृत दोनों ही हो सकता है।
प्रत्यारोपित होने वाले अंग
ह्रदय, गुर्दे, यकृत, फेफड़े, अग्नाशय, शिश्न, आंखें और आंत वे प्रमुख अंग हैं, जिनका प्रत्यारोपण होता है। प्रत्यारोपित हो सकने वाले ऊतक हैं- अस्थियां, कंडर (टेंडन), कॉर्निया, ह्रदय वॉल्व, नसें, बाहु और त्वचा।


