काठमांडू। गौतम बुद्ध का अवतार समझे जाने वाले राम बहादुर बामजन ने पशु बलि के खिलाफ आंदोलन शुरू किया है। यह आंदोलन भारत-नेपाल सीमा के पास बसे बाड़ा जिले के प्रसिद्ध गधिमाई मंदिर में दी जाने वाली पशु बलि को लेकर किया जा रहा है। राम बहादुर कई महीनों से अन्न-जल छोड़ कर तपस्या में लगे हैं। नवंबर के तीसरे सप्ताह में होने वाले उत्सव के दौरान इस मंदिर में लगभग बीस हजार भैंसों, बकरियों, सूअरों, मुर्गियों और कबूतरों की बलि दी जाती है। इसे पंच-बलि कहा जाता है। एक अन्य साधु पालदेन दोरजी तमांग रिंपोच ने भी पशु बलि रोकने के लिए तप शुरू किया है।
लवगुरु का लव मंत्र
‘कमाल-ए-आशिकी हर शख्स को हासिल नहीं होती, हजारों में कोई मजनू, कोई फरहाद होता है...’ यह शेर जवाहरलाल नेहरू विवि परिसर में एक विशेष व्याख्यान के दौरान गूंजा। व्याख्यान की विशेषता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें हिस्सा लेने के लिए बड़ी संख्या में छात्र इकट्ठा हुए और ठंड के बावजूद देर रात तक वहां डटे रहे। दरअसल, छात्रों के उत्साह का प्रमुख कारण व्या?यान का प्रेम विषय से संबंधित होना और व्याख्याताओं के रूप में लव बर्ड्स प्रो. मटुकनाथ और जूली का उपस्थित होना था। वक्ताओं ने भी छात्रों को निराश न करते हुए लव चैप्टरर्स की व्याख्या की और छात्रों से जम कर वाहवाही और तालियां बटोरीं।
सतलुज छात्रावास के मेस में ‘प्रेम और हमारा समाज’ विषय पर व्याख्यान देने के लिए मटुकनाथ, जूली के साथ पहुंचे। प्रोफेसर साहब ने व्या?यान को लव बुक से काम, प्रेम और चरम प्रेम नामक तीन चैप्टर के इर्द-गिर्द रखा। इस दौरान दोनों ने अपने प्रेम प्रसंगों से संबंधित छात्रों के प्रश्नों को धैर्य से सुना और उनका एक-एक कर बेबाकी से जवाब दिया। अपने संबंधों को नेचुरल बताते हुए उन्होंने इसे स्त्री-पुरुष के प्रेम की परिणति बताई। छात्रों द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में उन्होंने अपनी पत्नी आभा के संबंध को परिवार द्वारा थोपा गया रिश्ता बताया। हालांकि, उन्होंने अपनी पत्नी के अधिकारों का पूरा स?मान करते हुए अपनी सारी चल-अचल संपत्ति पूर्व पत्नी के नाम करने की भी बात बताई। प्रो. मटुकनाथ ने यह भी कहा कि चूंकि वह बहुत ज्यादा स्मार्ट नहीं है, इसलिए जूली ने उनसे भौतिकता के वशीभूत हो, प्रेम नहीं किया। इस दौरान युगल ने जेएनयू के भारतीय भाषा केंद्र में पढ़ाई के दौरान बिताए गए पलों को भी याद किया।
हजारों घंटे चलती रहेगी बैटरी
वाशिंगटन। टैक्नियन-इजराइल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी के वैज्ञानिकों ने पर्यावरण को नुकसान न पहुंचाने वाली नई सिलिकॉन एयर बैटरी विकसित की है। यह बैटरी बिना रुके हजारों घंटों तक बैकअप दे सकेगी और इसे बदले जाने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। ऑक्सीजन और सिलिकॉन से तैयार ये बैटरियां काफी हलकी होंगी। बिलकुल सूखी और बहुत ज्यादा आर्द्र परिस्थितियों में भी यह बैटरी बिना ठप हुए काम करती रहेगी।
इस बैटरी को चिकित्सा क्षेत्र में, सेंसरों में और सिलिकॉन से बने माइक्रो इलेक्ट्रॉक्सि में इस्तेमाल किया जा सकता है। चिकित्सा के क्षेत्र में इसका इस्तेमाल डायबेटिक पंपों को ऊर्जा देने और सुनने वाली मशीनों में हो सकता है। मटेरियल्स इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर और मुख्य शोधकर्ता याइर इन एली ने कहा कि सिलिकॉन एयर बैटरियों का इस्तेमाल पहले से उपयोग की जा रही बैटरियों की तरह ही होगा। उन्होंने कहा कि सिलिकॉन जैसे सुरक्षित, स्थायी आम पदार्थ से हम काफी हलकी बैटरियां बना सकते हैं। इन बैटरियों की उम्र बहुत लंबी होगी और यह उच्च ऊर्जा क्षमता वाली होगी।
बैटरियां बाद में मिट्टी में बदल जाएंगी
सिलिकॉन एयर बैटरियों से लागत में काफी कमी आएगी और वजन भी कम होगा, क्योंकि उनमें पारंपरिक बैटरियों की तरह बना कैथोड नहीं होगा। सिलिकॉन एयर (मैटर-एयर) बैटरी में कैथोड ऑक्सीजन होगी, जो कि एक झिल्ली से मिलेगी। प्रो. इन एली के अनुसार तीन से चार साल में सिलिकॉन एयर बैटरियों को और ज्यादा बेहतर बनाया जा सकता है, साथ ही उनमें रिचार्ज करने की तकनीक भी विकसित की जा सकती है। उनके मुताबिक अगले दस साल में यह संभव है कि इलेक्ट्रिक कारों की बैटरी भी सिलिकॉन से बनाई जा सकें। ये बैटरियां बाद में मिट्टी में बदल जाएंगी और फिर इन्हें रिसाइकल करके सिलिकॉन में बदला जा सकेगा और फिर ऊर्जा हासिल की जा सकेगी।
सावधान! मोबाइल से ब्रेन ट्यूमर का खतरा
लंदन। मोबाइल का लंबे समय से इस्तेमाल कर रहे हैं, तो सावधान हो जाएं। इससे ब्रेन ट्यूमर का खतरा है। मोबाइल से मस्तिष्क कैंसर होने की बात तो साबित नहीं हुई है, लेकिन एक नए अध्ययन में दावा किया गया है कि मोबाइल का लंबे समय तक इस्तेमाल करने से ब्रेन ट्यूमर का खतरा बढ़ सकता है। शोध करने वालों ने 23 प्रमुख अध्ययनों के विश्लेषण के आधार पर अपना निष्कर्ष दिया है।
इस अध्ययन में फोन के प्रभावों की पड़ताल की गई, जिसमें बारह हजार से ज्यादा रोगियों को शामिल किया गया, जिन्हें ब्रेन ट्यूमर था। साथ ही पच्चीस हजार ऐसे लोग भी लिए गए, जिन्हें यह बीमारी नहीं थी। ‘संडे एक्सप्रेस’ की खबर के अनुसार अध्ययन में निष्कर्ष निकाला गया कि दस साल तक या इससे अधिक समय तक मोबाइल के इस्तेमाल से ट्यूमर होने का खतरा 34 फीसदी तक बढ़ जाता है। विकिरण विशेषज्ञ डॉ. जॉर्ज कार्लो के हवाले से बताया गया है कि यह जानकारी हमारे डर की पुष्टि करती है और हमारे और भविष्य की पीढ़ियों के लिए गंभीर चिंता पैदा करती है।
इस संबंध में नतीजे जर्नल ऑफ क्लीनिकल ऑन्कोलॉजी में प्रकाशित किए गए हैं, जिसके मुताबिक 23 में से आठ अध्ययनों में विश्वसनीय और ताजा जानकारी है।
नई तकनीक से लैस मोबाइल लोगों को आकर्षित करता है, लेकिन पुराने हैंडसेट का सही निपटान नहीं होने से यह पर्यावरण को नुकसान पहुंचा सकता है। एक अनुमान के मुताबिक 2012 तक पृथ्वी पर आठ हजार टन पुराने सेलफोन का भार होने का अनुमान है, जिसका पर्यावरण पर दूरगामी असर पड़ेगा। वैश्विक परामर्श कंपनी डेलायट की ओर से जारी श्वेत पत्र के अनुसार सेलफोन के बढ़ते कचरे के निपटान की जरूरत है, क्योंकि इससे पर्यावरण को खतरा है।


