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गुजरा हुआ जमाना

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जब आंखों पर बड़े-बड़े चश्मे, झोले जैसे बैग, अलग ही तरह की हेयर स्टाइल फैशन में थी। इसके अलावा उस जमाने में रेडियो, बोले तो आकाशवाणी, विविध भारती लोगों का पसंदीदा था, स्याही के पेन से लिखना शानो-शौकत मानी जाती थी। लेकिन धीरे-धीरे समय आगे बढ़ता गया और ये सब चीजें दिखाई देना बंद होने लगीं। पर कहा जाता है ना कि इतिहास खुद को दोहराता है। इसीलिए उस जमाने का फैशन आज लोगों को बहुत पसंद आ रहा है। उस समय की चीजें अब फिर स्टाइल स्टेटमेंट के रूप में आ गई हैं। अब ऐसा लगता है कि वो गुजरा जमाना एक बार फिर लौट आया है।    - नगर प्रतिनधि

मोबाइल, कार, घर में एफएम की आवाज

15 अगस्त 1947 को नेहरूजी के आजाद भारत के भाषण को सुनने के लिए देश के पौने तीन लाख रेडियो एक साथ बज उठे थे। उस समय के लोगों के बीच रेडियो सुनना काफी लोकप्रिय रहा। विविध भारती पर बिनाका गीतमाला, हवामहल, क्रिकेट कॉमेंट्री सुनना बहुत रोमांचक था। फिर 1980 के बाद रेडियो की जगह टीवी ने ले ली। हर कोई टीवी का दीवाना हो गया। क्रिकेट कॉमेंट्री, गाने अब सुनाई नहीं, बल्कि देखे जाने लगे। लेकिन एक बार फिर रेडियो का दौर लौट आया और इसका श्रेय जाता है एफएम रेडियो चैनलों को। कार, मोबाइल के जरिये एक बार फिर रेडियो हम सबकी जिंदगी में लौट आया है। रेडियो सुनना अब सबकी आदत बन चुका है। 

- एमबीए कर रही यशस्वी पाल कहती हैं- मेरे पापा रेडियो सुना करते थे और अब मुझे रेडियो सुनना बहुत पसंद है। बीच में रेडियो का क्रेज खत्म हो गया था, लेकिन अब फिर से एफएम चैनलों से रेडियो का क्रेज बढ़ गया है। मैं तो जब भी बोर होती हूं, रेडियो चालू कर बैठ जाती हूं। बहुत ही अच्छा टाइम पास है ये। पापा तो कहते हैं कि रेडियो गुजरे जमाने की याद दिलाता है, लेकिन तब के रेडियो प्रसारण और अब के रेडियो स्टेशन में जमीन-आसमान का अंतर है।


जेब से निकलता है ब्रांडेड पेन

जब हम स्कूल में थे, तो सातवीं-आठवीं में पेंसिल छोड़ कर हममें से बहुतों ने फाउंटेन पेन अपनी उंगलियों में थामे। फिर बॉल पेन और जेल पेन ने उनकी जगह ली, लेकिन फाउंटेन पेन ने फिर से अपनी वापसी की और वो भी बड़े ब्रांड्‌स के साथ- मोब्लां, कार्तियर वगैरह। अब तो कई बड़े ब्रांड्‌स इन्हें एक लाख रुपए तक में बेच रहे हैं, क्योंकि अब ये स्टाइल स्टेटमेंट बन चुके हैं। फाउंटेन पेन से लिखना अपने आप में शान मानी जाती है। इसलिए ज्यादातर लोग अब इसे पसंद कर रहे हैं।

झोला है स्टाइलिश बैग

हमारे देश में खादी एक कपड़ा नहीं, बल्कि गांधीजी का बनाया गया आजादी का प्रतीक है। आजादी के बाद लोगों की रुचि धीरे-धीरे खादी के कपड़े से खत्म होने लगी थी, लेकिन सिंथेटिक और चमकीले कपड़े ने एक बार फिर खादी के झोलों को रास्ता दिखा दिया। अब खादी के अलग-अलग रंग और आकार वाले झोलों को लोगों ने अपने कंधों पर ले लिया है। अब तो विदेशी ब्रांड भी झोलों के आकार के बैग्स बना रहे हैं। राजनीतिक गलियारों से फैशन के गलियारों तक इन खादी  झोलों को बहुत पसंद किया जा रहा है। युवाओं के बीच ये झोला बैग काफी लोकप्रिय हो चुके हैं। पहले ये झोला बुजुर्ग लोगों की पसंद थी, लेकिन अब हर युवा इसे अपनाने में पीछे नहीं हैं। शिल्पी अग्रवाल कहती हैं कि ये झोला बैग स्टाइलिश लगते हैं। और तो और, इनमें सामान भी बहुत सारा आ जाता है। इसलिए मुझे तो ये बैग्स बहुत पसंद हैं। कॉलेज गोइंग हर स्टूडेंट इन्हीं बैग्स को पसंद करने लगा है। ये अलग डिजाइन और आकार के होते हैं। फैशन के अनुसार यही बैग अच्छे होते हैं।