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कहीं आग न लग जाए

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इंदौर के पेट्रोल और गैस पंपों पर लापरवाही

इंदौर के चार सीएनजी गैस और 114 पेट्रोल पंपों पर निगाह डाली जाए तो पता चलेगा कि वहां आग बुझाने के पूरे साधन नहीं मिलेंगे। पेट्रोल भरवाने वाले ही नहीं, पंप के कर्मचारी खुलेआम मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं। गैस पंप से लगे इलाके में थोड़ी ही दूरी पर बीड़ी-सिगरेट फूंकने वाले नजर आ जाते हैं। गैस का मामूली लिकेज भी आग भड़का सकता है।

गैस से चलने वाली गाड़ियों के मालिक भी कम लापरवाह नहीं हैं। एलपीजी और सीएनजी गाड़ियों में आग लगने की दुर्घटनाओं से भी सबक नहीं लिया गया है। एलपीजी की टंकियों (घरेलू गैस) से वाहन दौड़ाए जाते हैं। ये टंकियां फिट नहीं होतीं। गाड़ी की डिक्की में लुढ़क कर नली ढीली होते ही इनमें आग लग सकती है। सीएनजी में घटिया किट लगी होती है। ये आईएसआई मार्का नहीं है। ऊपर से देखरेख नहीं होने से गाड़ियों में आग लग जाती है।
टेम्पो के बदले चलने वाली मारुति वैन आग में राख होने की तीन-चार घटनाएं हाल ही के महीनों में हुई हैं, लेकिन किसी ने सबक नहीं लिया। कई बार मारुति वैन में बैठने वाले यात्री गैस की हल्की गंध आने की शिकायत करते हैं, लेकिन वाहन मालिक ‘तुम क्या समझते हो, हमको मालूम है, लीकेज नहीं है’ कह कर टाल देते हैं।

सराफा, धान गली, छोटा सराफा और बोहरा बाखल में गैस की टंकियों से सोने-चांदी और तेजाब का काम होता है। सराफा के हर मार्केट में औसतन दस से बीस घरेलू गैस या कमर्शियल टंकी से सुनारी का काम होता है।

कभी भी एक चिंगारी पूरे सराफा को जला कर राख कर सकती है। संकरे सराफा बाजार में अगर एक-एक कर ये टंकियां हादसे में फूटने लगेंगी, तो कौन आग बुझाने की हिम्मत करेगा। बोहरा बाजार, बोहरा बाखल, मारोठिया में तेजाब का जखीरा कभी भी बड़े हादसे की वजह बन सकता है। इंदौर में फायबर के ड्रमों में तेजाब को लाया-ले जाया जाता है। बड़ा गणपति और एरोड्रम रोड से लेकर धार रोड होकर एसिड के हजारों लीटर के टैंकर निकलते हैं। अगर कोई हादसा हो जाए तो घनी बस्तियों में कितने लोग मरेंगे, सुन कर ही रूह कांप उठती है। इंदौर के मरीमाता, बाणगंगा एरिया के पेट्रोल पंपों पर दिन-रात पेट्रोल के टैंकर खड़े रहते हैं। दूसरे पेट्रोल पंप भी अपवाद नहीं हैं। वहां भी टैंकरों के खड़े रहने या पेट्रोल खाली करते समय एक चिंगारी कहर बरपा सकती है।

फायर ब्रिगेड नाकारा

कहने को इंदौर फायर ब्रिगेड का हेड क्वार्टर है, फिर भी कभी आग लगने की आशंका वाले किसी स्थान पर मानीटरिंग आज तक नहीं की गई। खादीवाला पेट्रोल पंप की आग का दृश्य भुलाए नहीं भूलता है। शहर के बीच में राजकुमार मिल के पास के पेट्रोल भंडार में भी भयानक आग लग गई थी। अब वहां का भंडार मांगलिया चला गया है, लेकिन वैसी आग कभी भी, कहीं भी कहर बरपा सकती है। शहर के बीचोंबीच रानीपुरा में पटाखा मार्केट है। आग की एक चिंगारी यहां तबाही मचा सकती है, लेकिन किसे चिंता है। आश्चर्य की बात यह है कि विस्फोटकों का लाइसेंस देने वाले अफसर आंख मींच कर लाइसेंस दे देते हैं। नगर निगम, पुलिस, फायर ब्रिगेड, जिला प्रशासन के अफसर अगर जयपुर की आग से सबक लें तो बेहतर होगा, वरना हादसों के लिए किसी का इंतजार नहीं होता। एक चिंगारी शहर को राख के ढेर में बदल देती है।